आदि शंकराचार्य रचित पाँच श्लोक, सरल हिंदी अर्थ के साथ। इनमें 40 निर्देश हैं, जिनमें सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का अत्यंत संक्षिप्त और व्यावहारिक मार्गदर्शन है।
साधना का क्रम: कर्तव्य → भक्ति → सत्संग → आत्मचिंतन → बैराग्य → ध्यान → आत्मज्ञान → ब्रह्म में स्थित होना
कर्तव्य और शास्त्र अध्ययन (1-8)
- प्रतिदिन वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करें।
- अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें।
- हर कर्म को ईश्वर की पुजा समझकर करें।
- स्वार्थपूर्ण इच्छाओं का त्याग करें।
- अपने पापों और दोषों को दूर करने का प्रयास करें।
- संसार के सुखों की सीमाओं और दोषों पर विचार करें।
- आत्मज्ञान प्राप्त करने की तीव्र इच्छा जगाएँ।
- आसक्ति और मोह का त्याग करें।
सत्संग और भक्ति (9-16)
- संतों और सज्जनों का सत्संग करें।
- भगवान के प्रति अटूट भक्ति विकसित करें।
- मन की शांति, संयम और सदगुणों का अभ्यास करें।
- फल की इच्छा से किए जाने वाले कर्मों का त्याग करें।
- किसी योग्य सदगुरू की शरण लें।
- प्रतिदिन सत्य और आत्मतत्व का चिंतन करें।
- ब्रह्म का निरंतर ध्यान करें।
- उपनिषदों और वेदांत का श्रद्धापूर्वक श्रवण करें।
चिंतन, विवेक और आत्मबोध (17-24)
- उनके गूढ़ अर्थ पर मनन करें।
- वेदांत के सिद्धांतों को जीवन में अपनाएँ।
- व्यर्थ के तर्क-वितर्क से बचें।
- शास्त्रसम्मत विवेक और तर्क का प्रयोग करें।
- “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूँ) का चिंतन करें।
- अहंकार का त्याग करें।
- शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप न मानें।
- विद्वानों से अनावश्यक बहस न करें।
संयम, संतोष और बैराग्य (25-32)
- भूख को शरीर का रोग समझकर उसका उपचार करें।
- भोजन केवल शरीर-निर्वाह के लिए करें।
- स्वादिष्ट भोजन की लालसा न रखें।
- जो सहज उपलब्ध हो, उसी में संतोष रखें।
- गर्मी, सर्दी, सुख-दुःख जैसी परिस्थितियों को धैर्य से सहन करें।
- व्यर्थ और अधिक बोलने से बचें।
- वैराग्य और तटस्थता का अभ्यास करें।
- लोगों की प्रशंसा या कृपा पाने की इच्छा छोड़ दें।
ध्यान, आत्मज्ञान और ब्रह्म में स्थिति (33-40)
- एकांत में रहकर आत्मचिंतन का आर्नद लें।
- अपने मन को परमात्मा में स्थिर करें।
- अपने पूर्ण, दिव्य आत्मस्वरूप का अनुभव करें।
- इस जगत को ब्रह्म पर आशित और अंततः उसी का स्वरूप समझें।
- ज्ञान के द्वारा संचित कर्मों का क्षय करें।
- नए कर्मबंधनों का निर्माण न करें।
- प्रारब्ध कर्मों को धैर्यपूर्वक भोगें।
- अंततः स्वयं को परब्रह्म स्वरूप में स्थिर करें।

