🌺 श्री कमलापत्यष्टकम् 🌺
संस्कृत मूल पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्लोक १
भुजगतल्पगतं घनसुन्दरं
गरुडवाहनमम्बुजलोचनम्।
नलिनचक्रगदाकरमव्ययं
भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥ १॥
भावार्थ: हे मनुष्यो! शेषनाग की शय्या पर विराजमान, मेघ के समान श्यामवर्ण, गरुड़ पर सवार, कमल के समान नेत्रों वाले तथा शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करने वाले अविनाशी भगवान श्रीविष्णु का भजन करो।
श्लोक २
अलिकुलासितकोमलकुन्तलं
विमलपीतदुकूलमनोहरम्।
जलधिजाश्रितवामकलेवरं
भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥ २॥
भावार्थ: जिनके सुंदर, काले और घुँघराले केश भ्रमरों के समूह के समान हैं, जो निर्मल पीताम्बर धारण करके मन को मोह लेते हैं तथा जिनके वामांग में समुद्रपुत्री माता लक्ष्मी विराजमान हैं, उन श्रीकमलापति का भजन करो।
श्लोक ३
किमु जपैश्च तपोभिरुताध्वरैरपि
किमुत्तमतीर्थनिषेवणैः।
किमुत शास्त्रकदम्बविलोकनैः
भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥ ३॥
भावार्थ: हे मनुष्यो! केवल जप, तप, यज्ञ, तीर्थयात्रा अथवा अनेक शास्त्रों के अध्ययन में ही क्यों उलझे रहते हो? इन सबका वास्तविक उद्देश्य भगवान की प्राप्ति है। अतः श्रद्धा और समर्पण के साथ श्रीकमलापति का भजन करो।
श्लोक ४
मनुजदेहमिमं भुवि दुर्लभं
समधिगम्य सुरैरपि वाञ्छितम्।
विषयलम्पटतामपहाय वै
भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥ ४॥
भावार्थ: पृथ्वी पर प्राप्त यह मनुष्य शरीर अत्यंत दुर्लभ है और देवता भी ऐसे जीवन की कामना करते हैं। इस सत्य को समझकर विषय-भोगों में अत्यधिक आसक्ति का त्याग करो और भगवान श्रीहरि विष्णु का निरंतर भजन करो।
श्लोक ५
न वनिता न सुतो न सहोदरो
न हि पिता जननी न च बान्धवाः।
व्रजति साकमनेन जनेन वै
भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥ ५॥
भावार्थ: पत्नी, पुत्र, भाई, पिता, माता और अन्य संबंधी—इनमें से कोई भी मृत्यु के समय जीव के साथ नहीं जाता। इसलिए हे मनुष्यो! संसार के संबंधों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भगवान श्रीकमलापति का भजन करो।
श्लोक ६
सकलमेव चलं सचराचरं
जगदिदं सुतरां धनयौवनम्।
समवलोक्य विवेकदृशा द्रुतं
भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥ ६॥
भावार्थ: यह संपूर्ण चर-अचर संसार परिवर्तनशील है। धन, वैभव और यौवन भी स्थायी नहीं हैं। इस सत्य को विवेक की दृष्टि से समझकर विलंब किए बिना भगवान श्रीहरि का भजन करो।
श्लोक ७
विविधरोगयुतं क्षणभङ्गुरं
परवशं नवमार्गमलाकुलम्।
परिनिरीक्ष्य शरीरमिदं स्वकं
भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥ ७॥
भावार्थ: अपने इस शरीर को देखो—यह अनेक रोगों से प्रभावित हो सकता है, क्षणभंगुर है, अनेक परिस्थितियों के अधीन है और इसके नौ प्राकृतिक द्वार हैं। शरीर की नश्वरता को समझकर अपने जीवन का सदुपयोग करो और भगवान कमलापति का भजन करो।
श्लोक ८
मुनिवरैरनिशं हृदि भावितं
शिवविरिञ्चिमहेन्द्रनुतं सदा।
मरणजन्मजराभयमोचनं
भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥ ८॥
भावार्थ: जिन भगवान का श्रेष्ठ मुनिजन निरंतर अपने हृदय में ध्यान करते हैं, जिनकी भगवान शिव, ब्रह्मा और इंद्र सहित देवगण सदा स्तुति करते हैं तथा जिनकी शरण जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के भय से मुक्ति का मार्ग दिखाती है, उन श्रीहरि विष्णु का भजन करो।
फलश्रुति
हरिपदाष्टकमेतदनुत्तमं
परमहंसजनेन समीरितम्।
पठति यस्तु समाहितचेतसा
व्रजति विष्णुपदं स नरो ध्रुवम्॥ ९॥
भावार्थ: भगवान श्रीहरि के चरणों को समर्पित इस उत्तम अष्टक का उपदेश परमहंस महात्मा ने किया है। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इसका पाठ करता है, वह निश्चय ही भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है—ऐसी इस स्तुति की फलश्रुति है।
॥ इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीकमलापत्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥
पाठ संबंधी टिप्पणी: अलग-अलग प्रकाशित पाठों में कुछ शब्दों और वर्तनी के छोटे अंतर मिलते हैं। ऊपर प्रचलित पाठ के आधार पर श्लोक और भावार्थ दिए गए हैं।
🙏 श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की जय!
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

