पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए। सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है – इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक “पात्र” बन जाते हैं।
इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।
भाग 1 – गरुड़ पुराण क्या कहता है – अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है
गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं –
अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरः।
अन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है, और उसे खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो।
और दूसरा श्लोक –
जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी।
गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं –
- जाति दोष – अन्न किसने उगाया? किस भाव से उगाया? अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।
- निमित्त दोष – अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा – रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।
- आश्रय दोष – अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।
पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।
पूरा लेख (भाग 1 से 6)






