भाद्रपद शुक्ल पक्ष पंचमी — ऋषियों के स्मरण का दिवस।
सप्तर्षि मंत्र
कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वशिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
अर्थ: कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ — ये सात ऋषि स्मरण किए जाते हैं। इन्हें सप्तर्षि कहा जाता है।
ऋषि पंचमी का महत्त्व
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला ऋषि पंचमी पर्व हमारी महान ऋषि परंपरा के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मचिंतन का दिन है। इस दिन श्रद्धालु स्नान, पूजन, जप और व्रत के माध्यम से सप्तर्षियों का स्मरण करते हैं तथा अपने जाने-अनजाने दोषों के लिए क्षमा प्रार्थना करते हैं। यह पर्व हमें शुद्ध आचरण, संयम, सदाचार और लोककल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
चिरंजीवी ऋषि – सनातन परंपरा के जीवंत स्तंभ
सनातन परंपरा में लोमश, गर्गाचार्य, मार्कंडेय जैसे ऋषि चिरंजीवी माने जाते हैं, जो भक्तों पर अपना आशीर्वाद सदा-सर्वदा बनाए रखते हैं।
हम क्या सीखें?
- ज्ञान के जीवन में उतारें
- प्रकृति और समस्त जीवों के प्रति संवेदनशील रहें
- शुद्ध आचरण और संयम अपनाएं
- समाज और मानवता की सेवा करें
- अपनी परंपरा, संस्कृति और मूल्यों पर गर्व करें
आज भी प्रासंगिक है ऋषि वाणी
वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, दर्शन और असंख्य ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और प्रसार में ऋषियों का अद्वितीय योगदान रहा है। उनका दिखाया सत्य, धर्म और सेवा का मार्ग आज भी समाज को सही दिशा देता है।
ऋषि पंचमी का पर्व अपने ऋषियों को स्मरण करने का एक पावन दिन है। इसी दिन हम उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। हर कल्प के सप्तर्षि कल्प भर हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं। सप्तर्षियों के अलावा लोमश, गर्गाचार्य, मार्कंडेय जैसे ऋषि चिरंजीवी हैं, जो भक्तों पर अपना आशीर्वाद सदा-सर्वदा बनाए रखते हैं।
संहिता शास्त्री गर्गाचार्य अर्जुन प्रसाद बस्तौला जी
ऋषियों को नमन, ज्ञान परंपरा के प्रति कृतज्ञता

