संहिताशास्त्री श्री अर्जुन प्रसाद बास्तोला जी की कलम से

परंपरा क्या है ? परंपरा बड़ी है या शास्त्र ? क्या परंपरा का समुत्पादक व्यक्ति शास्त्र से भिन्न मार्गके रूपमें परंपरा को जान समझ कर स्थापित करता है या अनजाने में? क्या कोई शास्त्र विरोधी परंपरा को त्यागने का साहस कर सकता है? जब सामने परंपरा और शास्त्र के तथ्य परस्पर विरोधी हों तो श्रेष्ठता का प्रमाण कैसे ज्ञात किया जाय?

कलियुग की निर्मित परंपरा या कुछ वर्ष पूर्व की स्थापित परंपराको ढोया जाए अथवा अध्येता शास्त्रवेत्तासे परिप्रश्न
या शिष्य भाव से पूछा जाए?यदि फिर भी उत्तर दो प्रकार के प्राप्त हों तो किसे यथार्थ माना जाए ?
ये सभी तथ्य के विभिन्न भेद हैं पर जब तक इसे उदाहरण के साथ स्पष्ट न किया जाए तब तक स्पष्टता नहीं आती।


** स्वर्ग में पार्थिव शरीर के साथ नहीं जाया जा सकता पर त्रिशंकु ने सशरीर स्वर्ग जाने की हठ की। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपने तप बल से उसे स्वर्ग भेजने का यत्न किया। उन्होंने एक स्थापित परम्परा को तोड़ना चाहा।समर्थ व्यक्ति परंपरा गढ़ता भी है और तोड़ता भी है।
** ब्राह्मण को यज्ञोपवीत धारण करना अनिवार्य है पर अनेक लोग कहते हैं मेरे कुल में विवाह से पूर्व जनेऊ नहीं सहता। ये हमारी परम्परा है। विवाह नहीं हुआ तो जनेऊ भी नहीं।ये कैसी परम्परा?
** शास्त्र कहता है चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंग खेलना चाहिए पर कुछ लोग कहते हैं फाल्गुन पूर्णिमा को रंग खेलना हमारी परंपरा है।हम काशी के हैं।और लोग धर्म_ शास्त्र मानें।चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंग खेलें।हम तो पूर्णिमा में ही खेलेंगे।
** शास्त्र कहताहै सभ्यतापूर्वक रंग खेलना चाहिए।श्मशान में निरर्थक नहीं जाना चाहिए।अब काशी में इवेंट वाले मैनेजरों ने पिछले अनेक वर्षों से एक नई परंपरा शुरुकर दी श्मशान की होली।
कुछ लोग श्मशान की होली का विरोध कर रहे हैं पर इस इवेंट में एक भारी जन समुदाय संपृक्त है।अब यहभी एक
परंपरा बन गई।
** विवाह पद्धति में लाजा पुंज को मिलाते समय झगड़ा होने लगा। पंडित जी ने कहा वर लड़की के पैर के अंगूठे को पकड़े। वर पक्ष ने झगड़ते हुए इसका निषेध किया। जब मैने गृह्यसूत्र को खंगालना शुरु किया तो पता चला कि एक आचार्य ने ऐसा करने को कहा है अन्य सभी ने मना किया। इस तरह से परंपरा टकराने से बची।


" परं " तो केवल ब्रह्म है। " परा " मूल प्रकृति है। परं और परा के अन्वेषण में ही तो शास्त्र लगा रहता है। जो विषय परं और परा से जुड़ा है वही कल्याणकारी होता है। लोक विरुद्ध आचरण को शास्त्र भी मना करता है पर आचरण का निर्धारण जितनी गहनताऔर सूक्ष्मता से शास्त्र करता है,उसे विस्तृति देता है उतना एक साथ अन्यत्र नहीं देखने को मिलता।

लोकमें परंपराएं हरेक पचाससे सौ किलोमीटर पर अपना स्वरूप बदल देती हैं। परंपराएं यदि कल्याण को सृजित करेंतो उन्हें अंगीकार किए रखना चाहिए।यदिये विध्वंसक बन जाएं तो इन पर विचार करना चाहिए ।अपनी अपनी परम्पराओं पर डटे रहने वाले दूसरों की परंपरा का विरोध नहीं करते हैं।
यह समस्या बहुत पुरानी है। परंपरा के पक्ष में चित्तवृत्ति लगी रहती है।उसको भंग नहीं करना चाहिए पर शास्त्र का मंथन कर उसे लोक द्वय (इह और पर लोक)के लिए चुनना चाहिए। सभी की अपनी परंपराएं हैं। सभी के अपने गुरुकुल हैं। श्रेय का वरण विद्वान् करता है। कठोपनिषद के अनुसार नेत्र वाले का नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए अंधे का नहीं..... अंधेनैव नियमाना यथाsन्धा: ।।
हमारी परंपराएं शास्त्रानुगामी हों ।
हमारे शास्त्र श्रेष्ठ परंपरा का सृजन करें ।।

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